अधिकारियों की चाटुकारिता में कलम हुआ कलंकित,कुर्सी प्रेमी बने अधिकारियों की चापलूसी का औजार

गाज़ीपुर। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाने वाले मीडिया की विश्वसनीयता इन दिनों सवालों के कटघरे में खड़ी है। जिले में पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग जहां जन-सरोकार के मुद्दों, समस्याओं और भ्रष्टाचार को उजागर करने में लगा है, वहीं कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जिन्होंने कलम को अपने निजी फायदे और अधिकारियों की चापलूसी का औजार बना लिया है। हालात इस हद तक बिगड़े हैं कि विभागीय बैठकों से लेकर औचक इंस्पेक्शन तक, कुछ पत्रकारों की उपस्थिति अधिकारियों के लिए शक्ति-प्रदर्शन का साधन और जनसमस्याओं के लिए मज़ाक बनकर रह गई है। लोकतंत्र में पत्रकारिता का मूल दायित्व सत्ता की निगरानी और जनता की आवाज़ बनना होता है, लेकिन जिले के कई विभागों में आजकल पत्रकारों की भूमिका पूरी तरह उलट गई है। कई ऐसे चेहरे सक्रिय हैं जो खबर लिखने से ज्यादा अधिकारियों के साथ फोटो खिंचवाने और सोशल मीडिया पर पैगाम बांटने में मशगूल हैं। अफसरों की हर छोटी-बड़ी गतिविधि को ‘ऐतिहासिक’, ‘मील का पत्थर’ और ‘अभूतपूर्व’ बताने का फैशन इन पत्रकारों में इस कदर बढ़ गया है कि असल समस्याएं दबकर रह गई हैं।
इनमें से कुछ पत्रकार ऐसे भी पाए गए हैं जो विभागीय दफ्तरों में अधिकारी के आगमन से पहले ही ‘कवरिंग’ के नाम पर मौजूद हो जाते हैं। कई तो ऐसे हैं जिन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों के साथ नज़दीकी बढ़ाने को ही पत्रकारिता का असली लक्ष्य बना लिया है। हाल यह है कि किसी भी विभागीय लापरवाही, भ्रष्टाचार या सार्वजनिक परेशानियों की खबरें सामने आने से पहले ही ‘मैनजमेंट पत्रकारों’ की टीम मैदान में उतरकर उन मुद्दों को दबाने का काम करने लगती है। स्थानीय नागरिकों और जिले के कुछ पत्रकारों ने ऐसे चाटुकार पत्रकारों की बढ़ती गतिविधियों पर खुलकर नाराज़गी जताई है। उनका कहना है कि यह वर्ग जनसमस्याओं की आवाज़ उठाने के बजाय अधिकारियों की चमचागिरी में लगा रहता है, जिससे जिले में असली पत्रकारिता कमजोर हो रही है। कई विभागों में फाइलों में धूल जमा रहती है, योजनाएं ठप पड़ी रहती हैं, लेकिन इन पत्रकारों की ख़बरों में ऐसे अफसर ‘उत्कृष्ट कार्यों’ की मिसाल बनने लगते हैं।
कुछ पत्रकारों ने तो चापलूसी को इस स्तर तक पहुंचा दिया है कि वे अधिकारियों के आदेश, निर्देश, भाषण और निजी कार्यक्रमों तक को ‘तोड़ खबर’ बताकर प्रसारित करते हैं। जबकि वही अफसर जब जनता की शिकायतों पर खामोश रहते हैं, तो वही पत्रकार भी चुप बैठ जाते हैं। इससे जनता के बीच यह संदेश जाता है कि मीडिया अब उनकी नहीं, अधिकारियों की आवाज़ बन गया है।
जिले के कुछ पत्रकारों ने प्रशासन से भी अपील की है कि विभागीय गतिविधियों में पारदर्शिता लाई जाए और ऐसे पत्रकारों को बढ़ावा न दिया जाए जो सिर्फ अधिकारियों की छाया बनकर घूमते हैं। जिले की वास्तविक समस्याएं सड़कें, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अपराध इन मुद्दों पर काम करने की जगह ‘कुर्सी प्रेमी पत्रकारों’ का बढ़ता दखल जिले की छवि और पत्रकारिता दोनों को नुकसान पहुंचा रहा है। जनता का भी कहना है कि जब पत्रकार ही निष्पक्ष नहीं रहेंगे, तो समस्याएं कौन उठाएगा? ऐसे में आवश्यक है कि पत्रकारिता की मूल आत्मा को पुनः जीवित किया जाए और जनता-मुखी पत्रकारों को मंच मिले, न कि चाटुकारिता को बढ़ावा दिया जाए।




