“बीईओ के नाम पर जाति का ज़हर! पत्रकार नहीं, पहचान शिकारी हैं ये तथाकथित पत्रकार

(संवाद सूत्र करंडा) गाजीपुर | जिले में अब पत्रकारिता ख़बर नहीं बना रही — पहचान बिगाड़ रही है, जाति का ज़हर घोल रही है, और लोगों के चरित्र का तमाशा कर रही है।
ताज़ा मामला करंडा के खंड शिक्षा अधिकारी रविन्द्र सिंह का है, जिनका नाम जानबूझकर तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। सरकारी दस्तावेजों में साफ-साफ दर्ज है — “रविन्द्र सिंह”। लेकिन कुछ तथाकथित पत्रकार, जिन्हें न पत्रकारिता की तमीज़ है, न समाज की जिम्मेदारी, उन्हें “रविन्द्र सिंह पटेल” कहकर खबरों में घसीट रहे हैं।
यह नहीं है मासूम भूल — यह है सुनियोजित साजिश-
यह सिर्फ नाम की गलती नहीं, यह है जातिगत उकसावे की आग
यह है साख पर हमला
यह है प्रशासनिक गरिमा को मसलने की कोशिश
यह है कलम के नाम पर पेशेवर गुंडागर्दी!
बीईओ रविन्द्र सिंह ने फटकारते हुए कहा:
> “ये पत्रकार नहीं, पहचान के सौदागर हैं। अब अफसरों की जाति जोड़कर अपनी खबरों को ‘तेज’ बनाने में जुटे हैं।
मैं पूछता हूँ — कौन सा कानून इन्हें मेरी पहचान तोड़ने का अधिकार देता है?”
उनका आक्रोश अब चेतावनी बन चुका है —
> “अब और नहीं! अगर नाम से छेड़छाड़ बंद नहीं हुई तो मैं ऐसे फर्जी पत्रकारों को कानून के कटघरे में खड़ा करूंगा। प्रेस की आड़ में ये गंदा खेल अब बर्दाश्त नहीं करूंगा !”
सवाल अब सीधा है — और बेहद खतरनाक:
क्या गाजीपुर की पत्रकारिता अब अफसरों की जाति खोजने में लगी है?
क्या नाम बदलकर खबर बनाना अब नया धंधा है?
क्या कलम अब सवाल नहीं, साजिश लिखती है?
कब तक पहचान के साथ ये खुलेआम खेल चलता रहेगा?
गाजीपुर पूछ रहा है:
> “जब अफसर की पहचान सुरक्षित नहीं, तो आम जनता की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?”
“अगर नाम से खिलवाड़ पत्रकारिता है — तो फिर अफसरों को भी बताओ कि किस जाति में खबर देना है!”
“क्या अब उच्च अधिकारियों को भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने नाम का प्रमाणपत्र लेकर आना पड़ेगा?”
अब बहुत हुआ!
बीईओ रविन्द्र सिंह ने सिर्फ नाम नहीं बचाया —
उन्होंने गाजीपुर की सच्ची पत्रकारिता को भी आईना दिखाया है।



