गाजीपुर: कोर्ट का आदेश न मानने पर अपर न्यायाधीश गाजीपुर हुए सख्त, कहा- क्यों न प्रभारी निरीक्षक जमानियां की संपत्ति कुर्क कर भेजा जाए जेल

गाजीपुर। अपर न्यायाधीश गाजीपुर फर्स्ट शक्ति सिंह की कोर्ट ने न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश के बावजूद जमानियां थाना पुलिस द्वारा लाभार्थीगण को बेदखल कर विवादित भूमिखंड पर कब्जा करने के प्रयास की घटना को लेकर पुलिस के खिलाफ सख्त आदेश जारी किया है। अपर न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि न्यायालय के आदेश के अवहेलना के संदर्भ में क्यों न प्रभारी निरीक्षक जमानियां के विरुद्ध आदेश 39 नियम 2ए व्य.प्र.सं0 के अंतर्गत उनकी संपत्ति कुर्क कर तीन माह से अनाधिक अवधि के लिए सिविल कारावास में निरुद्ध किया जाये। अपर न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा है कि किन परिस्थितियों में जनपद न्यायाधीश गाजीपुर द्वारा पारित स्थगनादेश के उपरांत भी उनके द्वारा उनका अनुपालन किये जाने से इंकार किया गया। जबकि बाद की विषय वस्तु के संदर्भ में सिविल न्यायालय द्वारा स्थगनादेश अस्तित्व में था। तब किन परिस्थितियों में परगनाधिकारी के आदेश को विधिक सिद्धांतों के प्रतिकूल जाकर वरियता प्रदान की गयी। अपर न्यायाधीश के आदेश से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया है। ज्ञातव्य है कि न्यायालय सिविल जज, वरिष्ठ संवर्ग, गाजीपुर में मूल वाद संख्या-167/2015, गोवर्धन बनाम इन्द्रासनी देवी संस्थित किया गया। विद्वान सिविल जज, वरिश्ठ संवर्ग, गाजीपुर द्वारा पारित निर्णय दिनांकित 08.04.2025 के विरूद्ध जनपद न्यायाधीश महोदय के यहॉ सिविल अपील संख्या-37/2025, इन्द्रासनी देवी बनाम गोवर्धन पाण्डेय दायर की गयी। दिनांक 22.05.2025 को उभय पक्षों को सुनवाई का अवसर प्रदान किये जाने के उपरान्त जनपद न्यायाधीश, गाजीपुर महोदय द्वारा प्रार्थना-पत्र 6ग के आधार पर उभय पक्ष को वादग्रस्त सम्पत्ति के बाबत यथास्थिति बनाये रखने हेतु आदेशित किया गया। तदोपरान्त यह पत्रावली अन्तरण के माध्यम से इस न्यायालय को प्राप्त हुई है एवं दिनांक 22.05.2025 को पारित स्थगनादेश आज भी प्रभावी है। अपीलार्थीगण द्वारा इस न्यायालय के समक्ष प्रार्थना-पत्र 47ग अन्तर्गत धारा 151 व्य0प्र0सं0 प्रस्तुत कर यह तथ्य संज्ञान में लाया गया है कि पुलिस थाना जमानियॉ अपीलार्थीगण को बेदखल कर विवादित भूमिखण्ड पर कब्जा कर निर्माण कराये जाने के प्रयास में हैं एवं जब थाना जमानियॉ को न्यायालय का स्थगनादेश दिखाया एवं बताया गया कि विवादित भूमिखण्ड के बाबत जिला जज साहब का स्थगनादेश है तब थाना जमानियॉ द्वारा परगनाधिकारी के आदेश का हवाला देते हुए न्यायालय द्वारा पारित आदेश का अनुपालन कराये जाने से इन्कार कर दिया गया एवं यह भी कहा गया कि न्यायालय द्वारा पारित आदेश में थाने के लिए कोई निर्देश नहीं है। प्रार्थना-पत्र के कथन शपथ-पत्र 48ग से समर्थित हैं। जो अभिकथन आवेदन में थाना जमानियॉ के सम्बन्ध में किये गये हैं वे सभी प्रकरण की गम्भीरता को बढ़ा देते हैं एवं विधि के शासन की परिकल्पना जो भारतीय संविधान में वर्णित है में हस्तक्षेप करने का प्रयास प्रतीत होता है। ऐसे प्रकरणों में जिनमें सिविल न्यायालय का आदेश है, वहॉ पुलिस एवं प्रषासन का यह विधिक दायित्व है कि उक्त आदेश की अवहेलना कोई भी व्यक्ति नहीं कर पाये एवं यदि वह खुद इस कार्य में षामिल हो रहे हैं तब निष्चित तौर पर इस न्यायालय को अग्रिम विधिक कार्यवाई के लिए बाध्य होना पड़ेगा। जनपद न्यायाधीश महोदय के स्थगनादेश के उपरान्त भी परगनाधिकारी के आदेश को प्रभारी निरीक्षक जमानियॉ द्वारा वरीयता देना इस तथ्य का परिचायक है कि वह यह भी भूल चुके हैं कि न्यायिक पदानुक्रम क्या होता है। अतएव प्रभारी निरीक्षक जमानियॉ को आवेदिका द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-पत्र की प्रतिलिपि मय शपथ-पत्र प्रेशित किया जाए।



