बच्चों के बीच वोट की अपील! वायरल वीडियो ने स्कूलों में राजनीतिक दखल पर छेड़ी बहस

गाज़ीपुर। सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने शिक्षा संस्थानों की निष्पक्षता और शिक्षकीय मर्यादा को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। वायरल वीडियो में एक व्यक्ति, जिन्हें सोशल मीडिया पोस्टों में एमएएच इंटर कॉलेज, गाज़ीपुर के प्रधानाचार्य मोहम्मद खालिद उमर बताया जा रहा है, छात्रों के बीच एक ग्राम प्रधान प्रत्याशी के समर्थन में अपील करते हुए दिखाई दे रहे हैं।
हालांकि, इस वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि हमारा चैनल नहीं करता, लेकिन सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावों के मुताबिक यह कार्यक्रम उसिया गांव के एक विद्यालय का बताया जा रहा है, जहां एमएएच इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य बतौर अतिथि मौजूद थे। वीडियो में कथित तौर पर छात्रों से कहा जा रहा है कि वे अपने माता-पिता से एक विशेष उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने की अपील करें।
यदि वीडियो में किए जा रहे दावे सही हैं, तो यह मामला केवल एक सामान्य विवाद नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता, शिक्षकीय आचरण और लोकतांत्रिक मर्यादा से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है। विद्यालय वह स्थान है जहां बच्चों को ज्ञान, विवेक, संवैधानिक मूल्यों और स्वतंत्र सोच की शिक्षा दी जाती है। ऐसे में यदि किसी शैक्षणिक मंच से चुनावी संदेश दिया जाए या बच्चों को किसी प्रत्याशी के समर्थन का माध्यम बनाया जाए, तो यह शिक्षा के मूल उद्देश्य पर सवाल खड़े करता है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि बच्चे स्वयं मतदाता नहीं होते। ऐसे में उन्हें राजनीतिक संदेशों का वाहक बनाने की कोशिश, नैतिकता और शिक्षकीय जिम्मेदारी—दोनों कसौटियों पर सवालों के घेरे में आती है। समाज अपने बच्चों को विद्यालय इसलिए भेजता है कि वे जागरूक नागरिक बनें, न कि किसी चुनावी रणनीति का हिस्सा।
वायरल वीडियो को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज है और इसी के साथ कई अहम सवाल भी उठ रहे हैं।
क्या स्कूलों और शैक्षणिक आयोजनों को राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं रखा जाना चाहिए?
क्या बच्चों के सामने किसी प्रत्याशी के पक्ष में अपील करना शिक्षकीय मर्यादा के अनुरूप माना जा सकता है?
और यदि वीडियो के दावे सही हैं, तो क्या संबंधित प्रशासनिक और शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं करानी चाहिए?
शिक्षक और प्रधानाचार्य समाज में केवल प्रशासक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। इसलिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे हर परिस्थिति में निष्पक्षता, गरिमा और संवैधानिक मूल्यों का पालन करें। शिक्षा का मंच जितना पवित्र और राजनीति से मुक्त रहेगा, लोकतंत्र की जड़ें उतनी ही मजबूत होंगी।




